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प्रकाशक के डेस्क से

हिंदूइस्म : धर्म या जीने का तरीका ?

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हमारे प्रकाशक हमारी आस्था के बारे में लम्बे समय से चल रही ग़लतफहमी का सामना करते हुए हमें दिखाते हैं की कैसे हिंदूइस्म जीने के तरीके से अधिक है

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द्वारा सतगुरु बोधिनाथा वेय्लान्स्वामी

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“ क्या हिंदूइस्म सिर्फ एक जीने का तरीका है ?” यह एक सवाल है जो अक्सर मुझसे सत्संग सभाओं में पूछा जाता है। इस पर हमेशा ही जोशपूर्ण चर्चा होती है , क्योंकि इसमें गहरी दिलचस्पी और विचारों की जीवंत विविधता होती है। वर्षों पूर्व , चिन्मय मिशन के संस्थापक स्वामी चिन्मयानान्द नें इस विषय पर एक नाटकीय व्याख्यान दिया था (bit.ly/hinduism-way-of-life). यहाँ प्रमुख अंश प्रस्तुत हैं : “ हिंदूइस्म एक धर्मं नहीं है। यह जीने का एक तरीका है।” आप यह आज हर घर की बैठक में सुन सकते हैं जहाँ भी युवा बैठते हैं और हिन्दू संस्कृति और भारत की चर्चा करते हैं। आप उनको यह उद्धरण बडबडाते हुए सुन सकते हैं : “हिंदूइस्म पूरी तरह से अलग है ; यह धर्म नहीं है। तो फिर यह क्या है ? यह जीने का तरीका है।” यह एक गलत बयान है। कोई भी चिंतनशील व्यक्ति इसे स्वीकार नहीं करेगा और न ही इसको कोई वजन देगा। इस आकर्षक वाक्य में एक कितनी भद्दी मूर्खतापूर्ण बात छिपी हुई है। ‘ हिंदूइस्म एक धर्म नहीं है ; यह एक जीने का तरीका है।’ ओह ! में देख पा रहा हूँ ! और इसाइयत ? यह एक धर्म है ? ओह ! तो यह जीने का तरीका नहीं है ? बिना जीने के तरीके के धर्म क्या है ? बिना धर्म के जीने का तरीका कैसे हो सकता है ? सोचिये ! यह कहना कि यह धर्म नहीं है ; एक जीने का तरीका है , एक अंतर्विरोधी बात होगी। अगर हिंदूइस्म एक धर्म नहीं है , यह केवल एक जीने का तरीका है ; तब ईसाइयत एक धर्म है और इसलिए जीने का तरीका नहीं है। बिना जीने के तरीके के धर्म क्या है ? क्या धर्म हमें हमारी दुनियां और हमारे जीवन में मार्गदर्शन नहीं देता ? सो , यह एक खाली , आदम्बर्तापूर्ण बयान है।”

स्वामी जी आगे व्याख्या करते हैं कि इस धारणा का जन्म जर्मन भारतीय विद्या को जानने वालों द्वारा हुआ , जिन्होंने 1800 के अंत में मत शब्द का अनुवाद धर्म के रूप में किया : “ जर्मन लोगों नें , जिन्होंने पहले हमारे संस्कृत साहित्य का अनुवाद करने की कोशिश की , दुर्भाग्य से बड़ी भूल कर बैठे। उन्होंने मत का इस्तेमाल धर्म के रूप में किया : ‘ बुद्धा मत’, बुद्धा का धर्म ; ‘क्रैस्तावा मत, क्राईस्ट का धर्म ; ‘मुहम्मदिया मत’, इस्लाम। तब वे हिन्दू मत पे आये, और बेचारे जर्मन उलझन में पड़ गए , क्योंकि हिन्दू धर्म में बहुत सरे मत हैं। यह कई मतों का सम्मिश्रण है। मत संस्कृत के शब्द मति से निकला है जिसका अर्थ है ‘बुद्धि’. वेह जो बुद्धि में स्फटित होता है उसे मत कहते हैं। मत का मतलब केवल एक राय होना है। हिन्दू धर्म में शंकर मत, रामानुज मत, माधव मत शामिल हैं। विभिन्न आचार्यों नें जीवन के बारे में जो विभिन्न दृष्टिकोण दिए, और उपनिषदों द्वारा दिए गए व्यव्हार और विचार - इन सबको मत , मत और मत कहा जाता है। सो, जर्मन वालों नें यह निष्कर्ष निकाला कि हिंदूइस्म एक धर्म नहीं है। तब, यह क्या है , उन्होंने सोचा ? यह ‘ जीवन जीने का एक तरीका है !”

हिन्दू जो इस कुख्यात बयान के फायदों के बारे में पूछताछ करते हैं वे सामान्यतया हिंदूइस्म को व्यवहार में गहराई से अपनाने वाले नहीं होते। उनके दिमाग में यह होता है कि कुल मिला के हिंदूइस्म का अर्थ होता है धर्म का पालन करना , नेकी पूर्ण जीवन जीना और अपने कर्त्तव्य का पालन करना , और इसके इलावा कुछ करने की आवश्यकता नहीं है।

हिंदूइस्म एक जीने का तरीका है , किन्तु यह एक अध्यात्मिक तरीके से जीने का तरीका है , जिसमे अच्छा चाल चलन , पूजा , निस्स्वार्थ सेवा , शास्त्रों का अध्ययन एवं ध्यान शामिल हैं। और अध्यात्मिक रूप से जीवन जीने की परिभाषा क्या है ? धर्म ?

जबकि सनातन धर्म, जैसा कि जर्मन वालों नें देखा , आस्थाओं का एक परिवार है , साथ ही यह अपने आप में एक मज़बूत और गौरवशाली धर्म है। यह सारी आस्थाएं संस्कृति के कुछ तत्वों को , उपासना पद्धति , शास्त्र और कुछ मूल भूत दर्शन को परस्पर बाँटती हैं , जो कि मूल भूत मान्यताओं में परिलक्षित होता है : कर्म , धर्म, पुनर्जन्म, हर तरफ फैली दिव्यता और बहुत कुछ। हिंदूइस्म एक धर्म के सभी गुणों को बहुत शानदार तरीके से पूरा करता है , धर्म शब्द के हर पहलु को ध्यान में रखते हुए.

याद रखिये , जर्मन वाले कोई हिंदूइस्म के मित्र नहीं थे। उनकी हमारी आस्था की पुनर्व्याख्या एक धर्म न होने के रूप में एक जोरदार आलोचना थी , वो जिसे दुर्भाग्य से हिन्दुओं नें खुद ही अपना लिया। यह बौधिक रूप से आत्महत्या और वैश्विक स्तर पर सामाजिक संबंधों में एक आपदा है यह मानने से इंकार करना की हमारी आस्था एक धर्म है. हिंदूइस्म गौरव के साथ दुनियां की महान आस्थाओं के साथ खड़ा है, और यह ऐसा करता है इसलिए नहीं कि यह एक जीने का तरीका है। शाकाहार एक जीने का तरीका है। अहिंसा एक जीने का तरीका है। पर यह दोनों ही धर्म नहीं हैं और इनमे से किसी को भी दुनिया के धर्मों की संसद में आमंत्रित नहीं किया जायेगा जैसा की स्वामी विवेकनन्द को किया गया था सन 1 8 9 3 में। उनको आमंत्रित किया गया और वे शिकागो के मंच से दुनियां को संबोधित कर पाए केवल इसलिए की वे हिन्दू थे।

हाँ , ऐसे लोग भी हैं जो सोचते हैं कि “ एच - शब्द” के इस्तेमाल से कुछ गिरावट आ जाती है। परन्तु वे लोग गलत हैं। वे नज़र अंदाज़ कर रहे हैं धर्म शब्द के विश्व मंच पर लाने एवं साथ साथ स्थानीय सम्प्रदायों में , जो की दूसरी आस्थाओं के समूहों से हैं। हिंदूइस्म के बैनर के तले इकठे खड़े हो कर , हम आनंद लेते हैं बहुत सी उन सुरक्षाओं का जो धर्मों को दी जाती हैं, और हमारी एक सम्मानजनक , इकठी आवाज़ होती है मीडिया के लिए , सरकार के लिए, शिक्षा देने वाली संस्थाओं के लिए एवं योजना विभागों के लिये। हम ऐसे अर्ध हिन्दू समूहों को जानते हैं जो सामान्यतया एच शब्द के उपयोग से परहेज़ करते हैं , पर इसको बेसब्री से अपना लेते हैं जब उन्हें व्यापक समुदाय में अपनी साख बनानी होती है , जैसे की कोर्ट के मामलों में।

हिंदूइस्म का बेहतरीन भविष्य होगा जब हम दुसरे धर्मों के साथ कंधे से कन्धा मिला कर खड़े होंगे, न कि दुसरे जीने के तरीकों के साथ। वे हिन्दू जो तोते के तरह इस अवधारणा को प्रोत्साहित करते हैं कि हिंदूइस्म एक धर्म नहीं है वे सनातन धर्म की ठीक से सेवा नहीं कर रहे। वे यह देखने में नाकामयाब रहे हैं कि दुनियां की आँखों में उनका इस अवधारणा को आगे बढ़ाना कैसा बुरा दिखता है। तब क्या हो अगर मुस्लिम यह दावा करें की इस्लाम धर्म नहीं है बस केवल एक जीने का तरीका है ? या इसयिआत ? जूदाइज़्म ? वे ऐसा नहीं करते हैं। वे अपनी आध्यात्मिक पहचान पर गर्व करते हैं। परन्तु कई कारणों से , जिनमे से एक उपनिवेशवाद वाले दिमाग के लगातार उपद्रव मचने की वजह से है , हिन्दुओं द्वारा इस स्वयं को नाश करने वाले भ्रम को गले लगाया हुआ है। बहुत से स्वामियों नें 2 0 वीं शताब्दी के मध्य में पश्चिम में आन्दोलन ज़माने के लिए इस विचार को आगे बढाया ईसाईयों एवं यहूदियों को वेदांत, योग, ध्यान सिखाने के लिए ताकि उन्हें किसी प्रकार के धार्मिक विरोध का सामना न करना पड़े। इसके नतीजतन यह अवधार्नाएं अब घर घर में पहुंचे शब्द बन गए हैं पर इनको हिन्दू होने की मान्यता नहीं मिल पाई है। स्वामी चिन्मयानान्द नें बहुत ही ठीक से इसे कहा : “यह एक थोथा , ऊँची आवाज़ से करने वाला बयान है।” वेह जिसका हम अनदेखा कर सकते हैं।

ख़ुशी की बात है की इसमें छोटे परन्तु महत्वपूर्ण ढंग से परिवर्तन आ रहा है। जिस हिन्दू युवा से हम आज सामना करते हैं वे अपने धर्म से गौरवान्वित हैं और इसके बारे में और सीखना चाहते हैं। दुनियां भर के विश्वविद्यालयों में , हिन्दू छात्र दुसरे धर्म के छात्रों के साथ कंधे से कन्धा मिला कर गौरवपूर्ण तरीके से खड़े होना चाहते हैं। हिन्दू अमेरिकन फाउंडेशन का “योग वापिस लीजिये” अभियान , जो कार्यरत है इस परंपरा को पुनर्स्थापित करने में, जिसकी जड़ें दुनियां के सबसे प्राचीनतम विश्वास में हैं , एक निर्भीक अभ्यारोपण है ‘जीने के तरीके’ वाले तर्क के खिलाफ।

हर एक सत्संग जो मैं करता हूँ , एक बुनियादी सवाल सदा ही उठता है : “ में हिंदूइस्म को कैसे रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में व्यवहार में लाऊं ?” में इस बात पे जोर देता हूँ कि हिंदूइस्म को पूरी तरह से जानने और पूरी तरह व्यव्हार में लाने के लिए एक व्यक्ति को उन सब क्षेत्रों से जुड़ना चाहिए जो इसमें शामिल हैं : धर्म , पूजा , निस्स्वार्थ सेवा , दर्शन का अध्यन और ध्यान। एकसाथ यह पाँचों सम्पूर्ण शारीरिक, मानसिक , भावनात्मक एवं अध्यात्मिक चर्या बनाते हैं जिसका पालन जीवन भर किया जाना चहिये।

बिना दर्शन के भक्ति का अभ्यास आसानी से अन्धविश्वास में बदल सकता है। बिना भक्ति एवं निस्स्वार्थ सेवा के, दर्शन केवल मात्र बौधिक बहस और अटकलबाज़ी के निम्न स्तर पर आ जायेगा। हिंदूइस्म को केवल एक जीने का तरीका मान लेने पर , व्यक्ति को इसके भक्ति और दर्शन जैसे आन्तरिक लाभों से वंचित रहना पड़ेगा। और बिना ध्यान के , व्यक्ति को आत्मा और ब्रह्म , जीव और शिव की एकता के अनुभव का कोई तरीका नहीं है , जो की प्रकाश और मुक्ति की ऒर ले जाता है। आइये हम इन पांच परतों को और अधिक बारीकी से देखते हैं।

धर्म हिन्दू धर्म का आधार है , जैसा की आचार संहिता में संग्रहित किया है जिन्हें यम कहा जाता है। यम का अर्थ है ‘लगाम कसना’ या ‘नियंत्रित करना’ निम्न सहज प्रकृति को , जैसे की क्रोधित होना एवं दूसरों को नुकसान पहुँचाना, झूठ बोलना और चीजों को अपने हित में हेरफेर करना, एवं चोरी करके वो हासिल करना जो हम पाने की खवाहिश रखते हैं पर वैसे पा नहीं सकते। अपनी ऐसे सहज प्रकृति की अभिव्यक्ति को काबू में रखने की आवश्यकता है , क्योंकि की उनके अनुसार किये गए कर्म नकारात्मक कर्म पैदा करते हैं जिससे की व्यक्ति बराबर परेशानी की मानसिक स्तिथि में रहता है। धर्म में बहुत तरह की सांस्कृतिक श्रंखलाओं का पालन भी शामिल होता है।

सेवा , निस्स्वार्थ सेवा , हिन्दू परिपाटी का अगला आयाम है। कई व्यक्ति धार्मिक या बिना मुनाफा अर्जित किये चल रही संस्थाओं को दान दे कर सेवा करते हैं। जबकि अपने बटुए को खोल कर, कहें तो, 5 0 डालर दे देना आसान है ,निस्स्वार्थ सेवा और गंभीर प्रतिबधता मांगती है , जिसमे व्यक्ति के समय का बलिदान होता है। निस्स्वार्थ सेवा केवल मंदिर तक ही सीमित नहीं होती ; यह कार्यस्थल , स्कूल या जहाँ भी दुनियां में हम हों , की जा सकती है।

भक्ति प्रथाएं , जैसे की मंदिर में पूजा में शामिल होना, तीर्थ यात्रा पर जाना, अपने घर के मंदिर में पूजा करना और मन्त्र जपते हुए माला फेरना , विनम्रता को बढ़ाते हैं और सूक्ष्म उर्जाओं को ऊँचे चक्रों जैसे के मति एवं अध्यात्मिक प्रेम की तरफ ले जाते हैं।

शास्त्रों के अध्यन से दर्शन की साफ समझ की मज़बूत नींव का निर्माण होता है, भगवान् की ठीक समझ , आत्मा और दुनिया जो व्यक्ति के जीवन की हर आयाम के बारे उसे देते हैं। ऐसे अध्यन में शामिल हैं वेद , आगम , व्यक्ति के सम्प्रदाय के ग्रन्थ और साधू और संतों की की शिक्षा जो व्यक्ति के गुरु की परंपरा से जुडी है। अध्यन की सामग्री का चुनाव व्यक्ति के सम्प्रदाय के दर्शन के अनुरूप होना चाहिए। मसलन , अगर व्यक्ति की परंपरा अद्वैतवाद की है , तो अध्यन यह मजबूती से पुनर्स्थापित करेगा उस विचार को कि हम पहले ही भगवान् से एकीकृत हैं, और यह सच होने के लिए कुछ और होने की आवश्यकता नहीं है।

ध्यान एवं अन्य योगिक साधनायें , जो हिंदूइस्म का पांचवा पहलु है , व्यक्ति के आत्म साक्षात्कार का द्वार है। ध्यान व्यक्ति को अध्यात्म की दार्शनिक धारणाओं से परे सच के सच्चे अनुभव की ओर प्रेरित कर सकता है। इसे इस मिसाल से समझा जा सकता है जिसमे आप एक रसभरे , पके हुए आम के बारे में पढ़ते हैं और इसके मुकाबिल सचमुच उसको पहली बार चखते हैं। आप क्या करना पसंद करेंगे ? दो प्राथमिक दृष्टिकोण हैं। पहला , राज योग , जिसमे शामिल है नियंत्रित श्वास प्रक्रिया , इन्द्रियों की निर्लिप्तता, एकाग्रता और ध्यान। दूसरा है ज्ञान योग , यह शास्त्र अध्यन का मार्ग है , चिंतन और लगातार गहरा ध्यान।

यह पांच धार्मिक आयाम हिंदूइस्म की विभिन्न परम्पराओं में पाए जाते हैं, हर समूह एवं सम्प्रदाय इन्हें संजोता एवं संरक्षित करता है, अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक , भक्तिपूर्ण एवं दार्शनिक धरोहर की तरह।

Four dynamic stages:
1) As a student, gaining knowledge in math, science and other fields;
2) supporting and raising a family;
3) as a grandparent, semi-retired, devoting more time to religious pursuits and community programs while guiding one’s offspring and their children;
4) as the physical forces wane, withdrawing more and more into religious practices.

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1. Student, age 12–24
Brahmacharya Ashrama
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2. Householder, age 24–48
Grihastha Ashrama
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3. Senior Advisor, age 48–72
Vanaprastha Ashrama
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4. Religious Devotion, age 72 & onward
Sannyasa Ashrama

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