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प्रकाशक के डेस्क से

हिन्दुइस्म : मूल मानवतावाद

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धर्मं निरपेक्ष मानवतावाद एवं हिन्दू मानवतावाद का एक आलोचनात्मक परीक्षण उन युवाओं के लिए जो महाविद्यालय की शैक्षणिक नास्तिकता में डूबे हुए हैं

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द्वारा सतगुरु बोधिनाथा वेलनस्वामी

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image आधुनिक विश्वविद्यालय हमारे युवा वर्ग के मस्तिष्क को इस प्रकार ढालने में लगे हैं कि जिसका अंदाज़ा भी माता पिता नहीं लगा सकते। ऐसा इस लिए कि तर्क और विज्ञानं ऊँचे महाविद्यालयों के सीखने पर प्रभुत्व रखते हैं , धर्म को दरकिनार करते हुए , एक समझ आने वाली परन्तु सीमित शैक्षिक रणनीति के तेहत। यंहा तक कि अगर एक प्रोफेसर की मज़बूत धार्मिक प्रतिबधताएं हैं , संस्था के कानून [जिनका विशिष्ट अपवाद धार्मिक विश्व्विद्यालय होंगे] उन्हें अपने विश्वास को या उसकी बौद्धिक मंशा बाँटने की अनुमति नहीं देते। इसका परिणाम : धर्म निरपेक्ष नास्तिकता/अनीश्वरवादी मूल्यों की शिक्षा की मुख्य धारा में चिन्ह के रूप में प्रतिस्थापना।

बहुत से हिन्दू युवा घर से विश्व्विद्यालय के लिए जाते समय अच्छे हिन्दू होते हैं , किन्तु विषयों को एक विशेष प्रारूप में एक धर्म विरोधी पूर्वाग्रह से पढ़ने के बाद , वापिस आते हैं भगवान् , देवी देवताओं , भीतरी दुनियाओं , मृत्यु प्रांत जीवन और और अपने माता पिता के विश्वास के रहस्यवादी शिक्षण के अस्तित्व पर संशय करने लगते हैं. मैंने स्नातकों को अपने माता पिता को यह समझते हुए सुना है , जैसा कि एक नवयुवक नें हाल में किया ," हमें स्कूल में वैज्ञानिक प्रणाली को अपनानें और हर चीज़ पर प्रश्न उठाने का प्रशिक्षण दिया जाता है. में अब भगवान् में विश्वास नहीं करता क्योंकि भगवान् के अस्तित्व का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। " विश्वविद्यालय के नास्तिकवृत्ति के माहोल में डूबे हुए ये युवा दर असल हिन्दुइस्म से धर्म निरपेक्ष मानवतावाद में परिवर्तित हो गए है। विश्वविद्यालय , जो समान अवसर देने वाली संस्थाएं हैं , सभी विश्वास के पूर्वाग्रह से जो ग्रसित लोग नहीं हैं उनपर एक सा प्रभाव डालती हैं। यहूदी विद्यार्थी अधिक अविश्वासी हो कर घर वापिस आते हैं , कैथोलिक और अधिक उदारवादी हो जाते हैं एवं मुस्लिम जिस धर्म में पैदा होते हैं उसके प्रति अजनबी हो जाते हैं.

गुरुदेव का सामना इस मुद्दे से लगभग तीन दशकों पूर्व हुआ था. इसके जवाब में उन्होंने अपने स्वामियों को निर्देश दिया कि वे इस तरह के विचार करने वालों के विश्वास का सारांश तैयार करें और साथ साथ तीन दूसरे नास्तिकवादी दृष्टिकोणों के [भौतिकवाद, अस्तित्ववाद एवं साम्यवाद]. उन्होंने नतीजों को डांसिंग विद शिव [शिवेन सह नर्तनम् ] में प्रकाशित किया। उन्होंने महसूस किया कि विद्यार्थियों के लिए पश्चिमी विचार और सिद्धांत की विश्वास प्रणालियों को जानना कितना जरूरी है , क्योंकि वे ज्यादातर विश्वविद्यालयों के विषयों को प्रभावित करते हैं और अपने रंग में रंगते हैं। मेरे से युवा और माता पिता पूछते हैं कि हम हिन्दुइस्म एवं धर्मं निरपेक्ष मानवतावाद में कैसे सामंजस्य कर सकते हैं। अतः मैनें पन्ना नंबर 12 -13 पर नौ धर्मनिरपेक्ष मानवतावादी विश्वासों में से हर एक के जवाब में हिन्दू दृष्टि से बिंदु तैयार किये हैं।

मायने एवं जीवन के मूल्य तलाशने की अपनी खोज में , धर्मं निरपेक्ष मानवतावाद [या सीधे मानवतावाद , एक प्रमुख परिभाषा जिसे अनुयायी तरजीह देते हैं ] दुनियां को केवल तर्क एवं विज्ञानं के चश्मे से देखता है। इसकी नैतिकता की अवधारणा का विशुद्ध तर्कसंगत , गैर आध्यात्मिक आधार भी है।

सन 2002 में इंटरनेशनल ह्यूमनिस्ट एंड एथिकल यूनियन एम्स्टर्डम घोषणा को अपने आधिकारिक वक्तव्य के रूप में ज़ारी किया : "मानवतावाद एक लोकतान्त्रिक एवं नैतिक जीवन का रुख है जो पुष्टि करता है कि मानव जाति को अपने जीवन को मायने और आकार देने का अधिकार है और जिम्मेदारी है। यह एक और अधिक मानवतावादी समाज बनाने के लिए प्रतिबद्ध है जो नैतिकता पर और अन्य प्राकृतिक मूल्यों पर आधारित होगा और तर्क एवं स्वतंत्र जाँच पड़ताल की भावना से होगा जो मानवीय क्षमताओं से सम्भव हों। यह ईश्वरवाद सम्बंधित नहीं होगा और यह वास्तविकता के अलोकिक दृष्टिकोण को स्वीकार नहीं करेगा।”

हिन्दू छात्रों को धर्म निरपेक्ष मानवतावाद के ज़बरदस्त प्रभाव का सामना करने में मदद करने के लिए , मेरे सुझाव है कि हिन्दुइस्म मूल और औरों के मुकाबले में में सर्वाधिक मानवतावादी दर्शन है। इसमें वो सबकुछ है जो मानवतावाद में है और काफी कुछ ज़यादा भी है !

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SHUTTERSTOCK

Pondering issues: A college student is musing over the subjects his professor is presenting, most of which reflect Western views of reality. His challenge is to discover how they connect to his Hindu upbringing.
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मानवतावाद की एक मूल संकल्पना इसके तीसरे विश्वास से बयां होती है : " मैं मानव जाति के परिरक्षण एवं संवर्धन में विश्वास रखता हूँ क्योंकि यह मेरी परम चिंता है , और विश्व मानव परिवार , जिसे चाहिए कि वो पृथ्वी का संरक्षण करे आने वाली पीढ़ियों के लिए."

हिन्दुइस्म को इस अवधारणा का समर्थन करने में कोई आपत्ति नहीं है। फर्क इस प्रश्न में अन्तर्निहित है ,"मानवीय हालातों के किन पहलुओं का संवर्धन किया जाये एवं कैसे ?" हिन्दुइस्म उपरोक्त धर्म निरपेक्ष मानवीय मूल्यों को स्वीकार करता है और उसमें जोड़ता है जिसे वेह मानव जीवन का मूलभूत प्रयोजन मानता है - आध्यात्मिक तरक्की , भगवान् के समीप और समीप जाना [जो कि एकात्मत वालों के लिए व्यक्ति का अंतरतम, दिव्य स्वयं होता है ] कई कई जन्मों के अंतराल के बाद।

हिन्दुइस्म मानवता के आगे बढ़ने को दिव्यता के सन्दर्भ में देखता है , और निश्चित तौर पे सभी चीज़ों की दिव्यता , जिसमें भौतिक ब्रह्माण्ड शामिल है। एक हिन्दू इस तरफ इशारा करेगा कि प्रमात्रा भौतिक विज्ञानं यह व्यक्त करता है कि ब्रह्माण्ड स्वयं अलोकिक एवं सचेतन हैं , जिस अवधारणा को हमारे सदियों पुरातन शास्त्रों नें बखूबी बयां किया है।

जबकि धर्मं निरपेक्ष मानवतावाद भद्रता से अपने साथी मानवों की सेवा की हिमायत करता है , हिन्दू मानवतावाद निष्काम सेवा को कर्म योग के रूप में आध्यात्मिकता का दर्ज देता है , हमारे कार्य और हमारी सभी गतिविधियों को पूजा में तब्दील कर देता है और इस तरह हमें समीप ले आता है और महसूस करा देता है हमारे परमात्मा से सहज मिलन को। बी ऐ पी एस संस्था के प्रमुख स्वामी महाराज नें 2001 के भूकम्प के बाद अपने अनुयायियों को यह परामर्श दिया था : "जब लोगों को मुश्किलो और दुःखों का सामना हो , हमारे भारतीय परंपरा में उन्हें सांत्वना दी जाती है। हम यह महसूस करते हैं कि मानव जाति की सेवा करने से हम स्वयं परमात्मा की सेवा करते हैं। "

आदर्श रूप में हिन्दू दृष्टिकोण से सेवा द्वारा भगवान् की पूजा हिन्दू किशोरों को माता पिता एवं मंदिर से जुड़े अध्यापकों, दोनों के द्वारा ही सिखायी जाती है। साथ ही इन किशोरों का नियमित तौर पर सेवा सम्बन्धी परियोजनाओं में भाग लेना और अनुभव करना भी महत्वपूर्ण है। सौभाग्य से बहुत से मंदिर ऐसी सेवा योजनाओं का आयोजन करते रहते हैं. अगर आपके क्षेत्र में हिन्दू परियोजनाएं नहीं हैं , तब इन्हें सामान्य समुदाय में ढूंढने की कोशिश करें जिनमें पर्यावरण के सुधार , आपदा रहत , या ज़रूरतमंदों के लिए कपडे, खाना एवं परवरिश की गतिविधिया शामिल हों।

इन दोनों प्रकार के मानवतवादों में क्या कुछ अन्य प्रमुख अंतर हैं ? जबकि धर्म निरपेक्ष मानवतावाद तर्क को राजा की तरह गौरवान्वित करता है , हिन्दुइस्म जानता है की यह बस जानकारी के कई स्रोत्रों में से एक है। जो पहला अन्धविश्वास केह कर बुरा बताता है , दूसरा उसे रहस्यवादी अनुभव बता कर सम्मान देता है. जबकि धर्मं निरपेक्ष मानवतावाद कहता है कि मृत्योपरांत जीवन नहीं होता , हिन्दू मानते हैं कि प्रत्येक जीव आत्मा कई बार इस दुनियां में जन्म लेता है। वेह जन्म एवं मृत्यु के चक्र एवं पुनर्जन्म के विवेक को समझता है और इस जन्म में अच्छा करने का प्रयत्न करता है ताकि अगले जन्म में उसको एक उच्च मानस वाले परिवार में प्रवेश मिल सके। पुनर्जन्म का ज्ञान मृत्यु के भय को समाप्त कर देता है और, कर्म के नियम से मिला कर , मानवीय अनुभव की विविधता का बखान करता है। यह एक विडम्बना पूर्ण घुमाव ही है कि आज के विश्वविद्यालय विज्ञानं की सरहदें , न कि पुराने स्कूल की , गहराई से डूबी हुई हैं गैर स्थानीय चेतना की पढाई करने में [पढ़िए आत्मा और पुनर्जन्म] ब्रह्मांड के गैर भौतिकवाद [जो कि प्रमात्र भौतिक विज्ञानं का प्रिय है ] और पौधों एवं जड़ पदार्थों में जागरूकता। इसलिए , आज से एक सदी बाद यह टकराव एक विचार का विषय होगा।

गुरुदेव बताते थे कि कैसे हिन्दुइस्म " सामने लाता है पुनर्जन्म से सम्बंधित ब्रह्माण्ड की प्रक्रियाओं के बारे में एक अद्भुत विश्वास की भावना को जिसमें शामिल हैं कर्म के नियमों का ज्ञान और धर्म का विवेक जिसमें हरेक को एक उचित जगह प्राप्त होती है और जीवन का एक लक्ष्य भी मिलता है। यह बड़ी सोच लाता है जिसमे यह पूर्णतया स्वीकार किया जाता है कि दूसरे सभी धर्म एक ही भगवान् की रचना की अभिव्यक्ति हैं, आशीर्वाद हैं , शक्तिशाली मंदिरों के आस पास के पूर्णतया भक्ति भरे मार्ग का , पूर्ति है गहरी रहस्यवादी शिक्षण की जो योग पर आधारित है जिसे सामने लाने वालों में ऋषि , संत एवं गुरु और अन्य हैं। हमारा धर्म इतना मज़बूत है , इतना समृद्ध एवं इतनी विभिन्नताओं को लिए हुए , कि इसको पूरी तरह से समझ पाने का दावा करने वाले बहुत कम लोग होंगे। यह एक अति विशाल , एक अति विशाल धर्मं है , इतना विशाल कि कई बार इसको उन लोगों को समझाना कठिन होता है जो एक साधारण सिद्धांत को पकडे हुए होते हैं।

अपनी तीनों लोकों कि कार्यप्रणाली की समझ से , हिंदुओं के पास तीर्थयात्रा का आनंद भी है , जिसमें वे दुनिया के झंझटों को दरकिनार कर के पवित्र स्थलों की यात्रा शुभ समय पर करते हैं विशेष आशीर्वाद पाने के लिए। गुरुदेव नें व्याख्या की , " उन 'स्वतंत्र विचारकों से अलग जो कि स्वयं को मुक्त एवं धार्मिक जीवन से ऊपर समझते हैं , हम हिन्दू महसूस करते हैं कि भगवानों के दर्शन पा कर और उससे जो सहायता मिलती है , हमारे अस्तित्व को सबल बना देती है और हमें अध्यात्मिक जीवन में और अधिक मेहनती होने के लिए प्रेरणा देती है। तर्कवादियों से अलग सोच रखते हुए जो विश्वस्त महसूस करते हैं कि उनके भीतर ही उनकी ज़रूरतों के सभी संसाधन उपलब्ध हैं , और भगवान् की पूजा, सहायता मांगने के लिए करना एक निरर्थक एवं दयनीय अभ्यास होगा, हिन्दू विवेकपूर्णता से दिव्यता के आगे झुकते हैं और इस तरह अविश्वास की खाई को दरकिनार कर देते हैं। "

इसके इलावा रहस्यवादिता का अपना आनंद है। जैसा कि गुरुदेव नें कहा :"हिन्दू रहस्यवादी परंपरा कितनी भव्य है, इसमें शामिल हैं साधनाएं एवं योग , आकाशीय शरीरों, नाड़ियों और चक्रों , आभा मंडल और प्राणों , चेतना के विभिन्न स्तरों एवं अस्तित्व के अनेकों आयामों एवं और बहुत कुछ की समृद्शाली समझ."

विश्वविद्यालय जाने वाले युवा हिंदुओं को शैक्षिक दुनियां में डूबने के लिए तैयार होना चाहिए , जहाँ तर्क राजा है , एक अस्थायी जागरूकता को सीमित रखते हुए , पाठ्यक्रम से सबक हासिल करने के लिए , बिना अविश्वास और संदेह के रास्ते को अपनाते हुए। में युवा लोगों को यह मंत्रणा देता हूँ कि वे दिमाग में रखें कि बहुत से शिक्षाविद आस्तिकों को यह यकीन दिलाने के लिए प्रतिबद्ध हैं कि वे अज्ञानता के पथ पर हैं , और हिंदुओं को यह समझाना चाहते हैं कि हमारा धर्म अपरिष्कृत , पिछड़ा और अंधविश्वासों से भरा है। में उनसे अनुरोध करता हूँ कि वे स्कूल में अपनी अध्यात्मिक साधनाओं को ज़ारी रखें , जिनमे शामिल हैं पूजा, जप , योग, ध्यान और शास्त्रों का अध्यन और ऐसा विद्यार्थी बनने के लिए आगे बढ़ें जो एक महान विद्यार्थी के रूप में स्नातक हो लेकिन फिर भी वो एक अच्छा हिन्दू हो.

 

निम्नलिखित नौ धारणाएं जो शिवेन सह नर्तनम् : हिन्दुइस्म की समकालीन प्रश्नोत्तरी से ली गयी हैं , धर्म निरपेक्ष मानवतावाद पर दुनिया की राय को संक्षेप में प्रस्तुत करती हैं. इन्हीँ के नीचे, साथ साथ हम हर एक मानवतावादी धारणा का हिन्दू प्रतिपक्ष भी प्रस्तुत कर रहे हैं.

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धर्मनिरपेक्ष मानवतावाद की 9 धारणाए और उनका हिन्दू प्रतिपक्ष

1आस्तिकवाद को ख़ारिज करनामैं नास्तिकतावाद में विश्वास रखता हूँ , क्योंकि परमात्मा के अस्तित्व का कोई तर्कसंगत सबूत नहीं है इसलिए मैं किसी सर्वोच्च सत्ता के विचार की भ्रान्ति नहीं पालना चाहता।
2 धर्म और अंधविश्वास को खारिज करना मैं यह विश्वास करता हूँ पारम्पारिक धर्म और विश्वास झूठे सिद्धांतों का प्रचार करते हैं , दमनकारी हैं और अपने अनुयायियों को अज्ञानता ,धर्माधता और हठधर्मिता की ओर ले जाते हैं , और यह मेरा कर्त्तव्य बनता है कि में रूढ़िवादी धर्मों के भ्रम के प्रति सक्रिय रूप से अविश्वासी रहूँ और उनकी दुनियां को अलोकिक रूप में बयान करने की चेष्टाओं को चुनौती दूँ।
3 मानवता को आगे बढ़ानामेरे विश्वास है मानव जाति के परिरक्षण एवं संवर्धन में जो मेरी परम चिंता भी है , और वैश्विक मानव परिवार में जिसको पृथ्वी का परिरक्षण करना चाहिए आने वाली पीढ़ियों के लिए जिसके लिए एक सेक्युलर , ग्रहों की नैतिकता एवं कानून का तरीका होना चाहिए।
4 बिना एक भगवान् के अच्छा बनना मेरा मानना है कि एक अच्छी नैतिक ज़िन्दगी जीना व्यक्तिगत एवं सामूहिक ख़ुशी के लिए बेहद बढ़िया तरीका है और नैतिकता का एक तार्किक एवं धर्म निरपेक्ष आधार है।
5 मानवाधिकारों का संरक्षण मैं मानवाधिकारों, बौद्धिक एवं नैतिक स्वतंत्रता का और विस्तार करना चाहता हूँ , और धर्म निरपेक्ष प्रजातंत्र में , जिसमे चर्च और राज्य के बीच में सख्ती से अलगाव होगा , जिसके द्वारा भेदभाव ख़त्म हो और सबके लिए समानता एवं न्याय प्राप्त किया जा सके।
6 शिक्षा एवं स्वतंत्र अनुसन्धान मैं रचनात्मक मानवीय क्षमता का कला और विज्ञानं की शिक्षा द्वारा विकास में विश्वास रखता हूँ और अतिशय महत्व देता हूँ स्वतंत्र अनुसन्धान को एक खुले , मिश्रित , सार्वभौम समाज में।
7केवल तर्क पर भरोसामेरे विश्वास है तर्क के विकास एवं इस्तेमाल एवं आधुनिक विज्ञानं का जिससे ब्रह्माण्ड की उच्चतम स्तर की समझ प्राप्त हो सके , मानवीय समस्याओं का समाधान हो सके और हर व्यक्ति की सम्भावनाओं के बड़े तरीके से प्राप्ति होने में मदद मिल सके।
8 इस जीवन पर ध्यान केंद्रित करना ; जीवनोपरांत पर अविश्वास मैं विश्वास करता हूँ पूर्णता एवं ख़ुशी को इस जीवन में प्राप्त करने की चेष्टा में और पुनर्जन्म एवं जीवनोपरांत के सभी विचारों को ख़ारिज करने में उन्हें झूठा और आधारहीन मानते हुए , अपने मानवीय अस्तित्व की पूर्ण क्षमता यहाँ और अभी प्राप्त करने में , दूसरों की सेवा करने में और एक बेहतर अधिक न्यायपूर्ण दुनियां के निर्माण में।
9वैज्ञानिक रचनात्मकतामें डार्विन की क्रमागत उन्नति के सिद्धांत को मानता हूँ एक वैज्ञानिक वास्तविकता के रूप में , और स्वाभाविक तौर पे , यह मनाता हूँ कि जो संसार जाना जा रहा है केवल वही अस्तित्व में है और इसकी कोई परा प्रकृति या अध्यात्मिक रचना नहीं है , जो कि इसको नियंत्रित करती है या महत्वपूर्ण है।

and a Hindu Counterpoint

1 भगवान में मजबूत विश्वास मैं एक सर्व व्यापी सर्वोच्च सत्ता में विश्वास रखता हूँ जो की दोनों अंतनिर्हित एवं उत्कृष्ट है , दोनों विधाता और अव्यक्त वास्तविकता है. महान आत्माओं नें भगवान् के अपने व्यक्तिगत अनुभवों की पुष्टि की है , जिसके अस्तित्व को शास्त्रों नें भी दृढ़ता के साथ कहा है।
2 धर्मों के प्रति सम्मान मेरा विश्वास है कि दुनिया के धर्म दिव्यता के जायज़ एवं श्रेष्ठतम अनुभवों पर आधारित हैं। मेरा विश्वास है कोई भी धर्म विशेष यह नहीं सिखाता के वेह दूसरों के मुकाबले अकेला मोक्ष दिलवाने वाला है , परन्तु सभी धर्म के मार्ग परमात्मा के प्रेम एवं प्रकाश के सच्चे पहलु हैं, साहिषुणता एवं समझ के योग्य अधिकारी हैं।
3सभी की पवित्रता में जीवन की पवित्रता में विश्वास करता हूँ , जिसमे यह विशाल ब्रह्मांड अपनी सारी अभिव्यक्तियों सहित शामिल है , और पृथ्वी के और इसकी सभी जातियों के संरक्षण , अध्यात्मिक दिग्गजों के मूल्यांकन जो कि सरकार के मामलों में धर्मं निरपेक्ष नेताओं को राय देते हैं।
4 बभगवान् के द्वारा अच्छाई के लिए मार्गदर्शन मेरे विश्वास है कि नैतिक , धार्मिक जीवन व्यक्ति एवं समिष्टि के उच्चतम स्तर के लिए आवश्यक हैं और यह कि नैतिक मूल्य विश्वास की मिटटी में, अध्यात्मिक अनुभव, पवित्र ग्रंथों एवं सांस्कृतिक विवेक में अपनी जड़े रखते हैं.
5सब मानवाधिकारों का संरक्षण मैं मानवाधिकारों के संतुलन एवं ज़िम्मेदारियों में विश्वास करता हूँ , इस बात की ज़रुरत में कि सभी विश्वासों के अनुयायियों को धार्मिक एवं बौद्धिक स्वतंत्रता मिले और यह कि हिन्दू अध्यात्मिक सिद्धांतों का जब ठीक प्रकार से इस्तेमाल होता है , इससे भेदभाव ख़त्म होगा और सबको समानता एवं न्याय प्राप्त होगा।
6 ज्ञान एवं स्वतंत्रतामेरा विश्वास है कि मानवीय कर्म एवं क्षमताओं का बहुत बड़ा संग्रह है जो रचनात्मकता, कला, विज्ञानं की वृद्धि करता है , और निश्चित रूप से सब ज्ञान के रूपों की और लोग इसे अच्छी तरह से व्यक्त कर पाएंगे जब उन्हें बिना बंधनों के विचारों एवं अनुसन्धान की स्वतंत्रता होगी।
7तर्क और परम चेतना पर भरोसामेरा विश्वास है कि ब्रह्माण्ड की पूर्ण समझ के लिए परम चेतना एवं धार्मिक परंपरा एवं तर्क एवं विज्ञानं की सांझेदारी की आवश्यकता होती है , और यह कि इन दोनों में कोई अन्तर्निहित संघर्ष नहीं है।
8 पुनर्जन्म में विश्वासमैं पुनर्जन्म में विश्वास करता हूँ , और यह कि आत्मा , चेतना गैर स्थानीय हैं एवं शारीरिक मृत्यु के बाद भी जीवित रहते हैं। फिर भी पूर्व या भविष्य के जीवन में रहना फलदायक नहीं होगा और विवेकपूर्ण होगा जीवन को पूर्णतया अभी में जीना , अपने धर्म को पूरा करते हुए , जिससे कि हम अपने अगले जीवनों में उच्चतर लक्ष्य की प्राप्ति कर सकें।
9आधुनिक विज्ञानं की खोज मेरा विश्वास है कि प्राकृतिक एवं परा प्रकृति एक ही वास्तविकता के रूप हैं , कि विज्ञानं ब्रह्माण्ड को मापने का केवल एक पैमाना है , वास्तव में प्रमात्रा भौतिकी गैर पदार्थ चीज़ों के आयामों को पता लगा रही है और हिन्दुइस्म की इस घोषणां को मान्यता दे रही है कि वो एक चेतना ही है जो सारे ब्रह्माण्ड में व्याप्त है।

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