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जब बच्चे हिन्दुइस्म को गले लगायें
Category : Hindi - हिंदी

प्रकाशक के डेस्क से

जब बच्चे हिन्दुइस्म को गले लगायें

अपने विश्वास को उन तक पहुँचाने के लिए उत्तम परिणाम प्राप्त करने हेतु अवधारणाओं को जीवन बढ़ाने वाले उपकरणों की तरह प्रस्तुत करें ना कि जीवन को सीमित करने वाले नियमों क़ी तरह



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बहुत अधिक बार बच्चों एवं युवा लोगों को हिन्दु अवधारणाओं एवं प्रथाओं को नियमों क़ी तरह समझाया जाता है ना कि उपकरणों के रूप में. नियम, हम जीवन में क्या कर सकते हैं उसे प्रतिबंधित करते हैं एवं ऐसे महसूस कराते हैं चीज़ें कम सुखद हैं. बच्चे खास करके, बहुत से नियम होने पर विद्रोही हो जाते हैं. दूसरे हाथ पे उपकरण उन्हें अधिक प्रभावशाली बनाते हैं एवं उनके जीवन की गुणवत्ता को सुधारते हैं.

हम उलझे हुए नियमों को लुभावने उपकरणों में परिवर्तित कर सकते हैं, किसी भी प्रथा या अभ्यास में शामिल प्रक्रियाओं को स्पष्ट रूप से बताते हुए एवं उससे होने वाले लाभ को भी समझाते हुए. उद्देश्य है बच्चे की रूचि को समझने की और उसको यह दिखाने की कि हिन्दुइस्म उसकी अध्यात्मिक प्रगति में मददगार साबित होगा और इससे उसको एक खुशहाल एवं सफल जीवन जीने का आनंद प्राप्त होगा. यह प्रेरणा होती है ना कि नियम, जो लोगों को आगे बढ़ने के लिए प्ररित करते हैं एवं बच्चे भी इस मामले में भिन्न नहीं होते.

कल्पना कीजिये एक ऐसे किशोर कि जो अपने माता पिता को तीन पारिवारिक तौर तरीकों को ले कर चुनौती देता है : "हम शाकाहारी क्यों हैं ?", "हमको हर सप्ताह मंदिर जाने कि क्या आवयश्कता है ?", "में अपने दोस्तों की तरह हिप होप संगीत क्यों नहीं सुन सकता ?". दुर्भाग्य से माता पिता ऐसे प्रश्नों के सोचे समझे , संपूर्ण जवाबों के लिए समय नहीं निकाल पाते एवं आसन रास्ता अपना कर आज्ञा पूर्वक कहते हैं," हमारा परिवार यह हमेशा से करते आया है." क्योंकि उनके बहुत से दोस्तों को ऐसे सख्त आचार संहिता का पालन नहीं करना पड़ता है , इन जवाबों को सुनने वाले युवा आसानी से यह निष्कर्ष निकल सकते हैं की हिन्दुइस्म एक ऐसे नियमों का संकलन है जो जीवन को नाखुश एवं प्रतिबंधित बनता है. इससे पहले कि इन सवालों के जवाब इस तरह दिए जाएँ कि नियमों को उपकरणों में परिवर्तित किया जाये , आइये हम कुछ बुनियादी अवधारणाओं की समीक्षा कर लें. यह वो हैं जिन्हें में कहता हूँ - "बड़े विचार ".

दो बड़े विचार

पहला बड़ा विचार है कि हर चीज़ हमारी चेतना को प्रभावित करती है. मेरे गुरु के गुरु, श्रीलंका के योगास्वामी नें व्याख्या की : " जैसा आप सोचते हैं वैसे आप बन जाते हैं. अगर आप भगवान सोचते हैं तो भगवान बन जाते हैं. अगर आप भोजन सोचते हैं तो आप भोजन बन जाते हैं. हर एक चीज़ चेतना को प्रभावित करती है."

दूसरा बड़ा विचार है कि हम में से हर एक , एक आत्मा है, एक दिव्य प्राणी है जो एक शरीर में रहता है और हमारी तीन प्रकार कि प्रकृति है. बहुत गहराई के स्तर पर हम एक शुद्ध, उज्जवल एवं आनंदमय आत्मा हैं. वेह हमारा अध्यात्मिक या सहज स्वाभाव है. हमारा एक बौधिक एवं सहज स्वाभाव भी है. तो हमारे तीन पहलु हैं : अध्यात्मिक [जानना , होना ], बौधिक [सोचना] एवं सहज [महसूस करना]. हमारा सहज स्वभाव , निचले स्तर का, पशुओं जैसा जिसमे आत्म संरक्षण , प्रसव की चाह, भूख और प्यास शामिल हैं. इसमें जो अन्य भावनाएं शामिल हैं वो है लालच , घृणा, क्रोध, भय , वासना और इर्ष्या. यह हमारी भावनात्मक एवं महसूस करने वाली प्रकृति है.

बौधिक स्वभाव हमारी वो शक्ति है जिससे हम तार्किक रूप से सोच एवं बहस कर सकते हैं. यह विद्वतापूर्ण तरीके से सोच सकने का स्त्रोत है. सहज स्वभाव प्रकाश का मन है, सर्वज्ञ जानना है . सर्वव्यापी जागरूकता है, शुद्ध चेतना , सत्य एवं प्रेम है. यह हमारी अध्यात्मिक प्रकृति है.

बड़े विचारों की इस जोड़ी का प्रयोग करके , अब हम तीनों प्रश्नों का उत्तर देने को तैयार हैं.

हम शाकाहारी क्यों हैं ?

भारत में , शाकाहार अच्छी तरह से स्थापित है और मांस का नहीं खाना शायद कभी भी आलोचना का कारण नहीं होता. जबकि अन्य देशों में, शाकाहारी होना एक अपवाद होता है एवं शाकाहारी बच्चे अक्सर उपहास, दूसरे साथी बच्चों के दबाव एवं छेड़ने का कारण बनते हैं. जो बात इस अपमान को और चोट पहुंचती है वो यह है कि बहुत से स्कूलों की खाने पीने की जगहों पर एवं सामाजिक मिलने जुलने के मौकों पर शाकाहार के विकल्प बहुत कम, अव्यवहारिक और अस्वास्थ्यकर होते हैं. व्यवहारिक रूप से ऐसा कुछ भी नहीं होता जिसे शाकाहारी छात्र खा सकें.

कोई बहुत आश्चर्य की बात नहीं है कि बच्चे आसन रास्ता अपनाते हैं एवं शाकाहारी भोजन को त्याग देते हैं. हालाँकि शाकाहारी होना चाहिए इसके लिए काफी मजबूर कर देने वाले कारण हैं. जिसमे से एक प्रमुख कारण यह है कि मांस खाना उनकी चेतना को नकारात्मक तरीके से प्रभावित करता है , जो उन्हें उनकी सहज निम्नस्तर की प्रकृति की ओर ले जाता है.

बच्चों को यह समझाएं की अगर उनको उच्चतर चेतना की अवस्था में रहना है , अपनी आत्मा की प्रकृति में , शांति और प्रस्सनता से, जिसमे वे सब जीवों को प्यार कर सकें , वे मांस, मछली , शंख मछली एवं अंडे नहीं खा सकते. इसका कारण यह है कि मोटे तौर पे पशुओं से बने आहार के रसायनों को शरीर में आत्मसात करने से वे शरीर एवं मन में गुस्सा, इर्षा , भय, तनाव, संदेह एवं मौत का भयानक डर प्रवेश करने का रास्ता खोल देते हैं जो कि बुरी तरह से मारे गए पशुओं के रसायनों में बंद होते हैं.

दूसरे शब्दों में , मांस खाने से उनके सहज स्वभाव को शक्ति मिलेगी जिससे कि वे इन निम्न भावनाओं क़ी तरफ खिचेंगे. मांस के खाने से वे अधिक बार गुस्सा करेंगे एवं ख़राब मानसिक स्थिति का भी अनुभव करेंगे. मेरे गुरु ने कहा था, " शाकाहार बहुत महत्त्वपूर्ण है. मेरे पचास सालों के सन्यास जीवन में यह काफी स्पष्ट हुआ है शाकाहारी परिवारों में गैर शाकाहारी परिवारों के मुकाबले बहुत कम समस्याएं पेश आती हैं." सारी दुनियां में बच्चे जो इस समझ से जागृत हो रहे हैं , वे अपने आप ही शाकाहारी बन रहे हैं. और इन दिनों जी पी एस से सुस्सजित आई पैड हैं एवं थोड़े से अनुसन्धान एवं कल्पनाशीलता से शाकाहारी विकल्पों के बारे में कहीं से भी जानकारी प्राप्त की जा सकती है.

हमें हर हफ्ते मंदिर क्यों जाना चाहिए ?

बच्चों को बताने के जरुरत है कि मंदिर में पूजा करना एक परंपरागत तरीका है जो हिंदुइस्म हमें देता है जिससे कि हम अपने आत्म स्वरुप से जुड़ सकें और आनंद कि अनुभूति कर सकें , जो की आत्मा के सहज परमानन्द की स्थिति है. वे मंदिर जा सकते हैं जब वे असंतोष का अनुभव कर रहे हों, ऐसे में वे भगवान एवं देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त करके ख़ुशी और उच्चावस्था को प्राप्त कर सकते हैं. यह कैसे संभव है ? देवता का आशीर्वाद उनके मन और आभा को उलझे हुए विचारों एवं भावनाओं से मुक्त करके दोबारा से अपनी अंतर आत्मा से जोड़ देता है. आशीर्वाद उनको उनके निम्न प्रकृति से उठा कर , उनके बौधिक स्वरुप को नरम करते हुए उन्हें उनके आध्यात्मिक स्वरुप की तरफ ले जाता है.

एक बार बच्चों को यह विचार समझ आ जाये कि मंदिर कि पूजा एक महान उपकरण है जिससे उनकी भावनाओं को स्थिर किया जा सकता है , जबकि वे परेशान हों , उनकी परिवार के साथ मंदिर जाने की अनिच्छा में बदलाव आ जायेगा. मंदिर उनके लिए भी महत्वपूर्ण हो जायेगा, ना केवल माँ और बाप के लिए. मंदिर की पूजा उनके शांत एवं केन्द्रित रहने में सहायक होगी , तब भी जब वे कठिन परिस्थितियों से गुज़र रहे होंगे. वे यह समझ पाएंगे की सही भावना से जाने से वे स्वयं को वापिस ठीक से एकजुट कर पाएंगे. वो ऐसा एक स्थान भी है जहाँ पुराने ज़ख्मों पर मलहम लग जाती है.

बच्चों को सिखाएं कि वे मंदिर जा कर अपनी समस्याओं को देवता के चरणों में रखें , देवता के लिए चढ़ावा ले के जाएँ और उससे अपनी अप्रसन्नता के बारे में बात करें, ठीक वैसे जैसे के वो अपने इस भौतिक दुनिया के दोस्त से बात कर रहे हों. वहां वे देवता के साथ एक गहरी आन्तरिक प्रक्रिया से गुजरेंगे एवं देवता से आशीर्वाद प्राप्त करेंगे अगर वे ठीक प्रकार से अपने को खोल पाएंगे. वे पाएंगे कि जब वे मंदिर से बाहर आयेंगे , उन्हें याद भी नहीं रहेगा कि उनकी क्या समस्या थी. यह सफलता का संकेत होगा.

बेशक हर सप्ताह मंदिर जाने का फायदा केवल इस विषय में सफलता तक सीमित नहीं होगा कि जब वे भावनात्मक रूप से परेशान होंगे. यहाँ तक कि जब जीवन में सब ठीक ठाक चल रहा होगा , मंदिर में तन्मयता से एवं जागरूकता से पूजा करने से वे अपने आत्मा स्वरुप के भीतर गहरे तक जा पाएंगे.

वे अधिक करुनामय एवं समझ वाले बनेंगे , वे जीवन में आने वाली चुनोतियों का बेहतर तरीके से सामना कर पाएंगे. एक बार जब आपका बच्चा यह समझ जायेगा कि पूजा एक शक्तिशाली हिन्दू उपकरण है ना कि केवल मात्र एक वयस्कों द्वारा बनाया गया नियम, वो आपको स्वयं प्रति सप्ताह मंदिर जाने के लिए कहेगा.

मैं हिप-होप संगीत क्यों नहीं सुन सकता ?

संगीत जब एक विस्तृत अवधि के लिए सुना जाता है इसका हमारे चेतना के स्तर पर गहरा प्रभाव पड़ता है. जो भी बच्चे सुनते हैं उनको चेतना के एक या दूसरी अवस्था की ओर ले जाता है. मेरे गुरु सतगुरु सिवाय सुब्रमुनियास्वामी इस विषय पर खुल कर अपनी बात कहते थे. वे महसूस करते थे कि घर पर जिस प्रकार का संगीत बजाय जाता है और जो सन्देश वो देता है , वेह महत्वपूर्ण होता है. उनका कहना था कि इस बारे में काफी सावधानी बरतनी चाहिए और घटिया संगीत एवं गाने जो निम्न चेतना से जुड़े हों उन्हें नहीं बजाना चाहिए. " ड्रग्स कि संस्कृति और उसका राक्षसी संगीत मानवीय चरित्र एवं संस्कृति के ताने बाने को ख़तम कर देता है." अगर आपका बच्चा इस विचार को समझ लेगा, उसकी संगीत कि वरीयताएँ विकसित होंगी - इसलिए नहीं कि इसकी वजह आपके थोपे गए नियम हैं, बल्कि इसलिए की उसको समझ आ चुका है कि किस तरह विभिन्न प्रकार के संगीत का उसके मूड एवं मन पर असर पड़ता है. कम से कम वो संवेदनहीन नकारात्मक एवं हिप - होप से बचेगा एवं उच्च शैली के संगीत को सुनेगा. आदर्श रूप से घर में बजने वाला संगीत सुंदर हिन्दू संगीत होना चाहिए जिसे पारंपरिक उपकरणों पर बजाया जाये एवं जो परिवार में हर एक को उनके आत्म स्वरुप की परिष्कृत एवं सुसंस्कृत प्रकृति से जोड़ सके.

याद रखियेगा कि उपकरण , नियमों से बेहतर प्रमाणित होते हैं !

अपने बच्चे के हर हिन्दू तौर तरीके के बारे में किये गए प्रश्नों के समझदारी से जवाब देने के लिए समय निकलना सच्चे मायनों में एक सार्थक बात होगी. अपनी व्याख्या में यह बताना शामिल करें कि कैसे अभ्यास या प्रतिबन्ध उसकी चेतना को प्रभावित करेंगे. इससे उसके अभ्यास को उत्साहपूर्वक करने के अवसरों में वृद्धि होगी. और कुछ मामलों में , आपका बच्चा इस बात के लिए प्रेरित होगा कि वो दूसरे हिन्दू युवाओं को भी इन बातों को आजमाने को कहे !